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8 लाख में दो रिकवरी ट्रॉली की खरीद पर सवाल, बिना वित्तीय स्वीकृति लगातार हो रहे ऑर्डर?

प्रतापगढ़ के डॉ. सोनेलाल पटेल स्वशासी राज्य मेडिकल कॉलेज में ₹8 लाख की दो इमरजेंसी रिकवरी ट्रॉली खरीद पर सवाल उठे हैं। वित्तीय स्वीकृति, खरीद प्रक्रिया और सरकारी धन के उपयोग को लेकर जांच की मांग तेज हुई।

प्रतापगढ़।

डॉ. सोनेलाल पटेल स्वशासी राज्य मेडिकल कॉलेज एक बार फिर खरीद प्रक्रियाओं को लेकर सवालों के घेरे में है। इस बार मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने जीईएम (GeM) पोर्टल के माध्यम से दो ‘इमरजेंसी रिकवरी ट्रॉली’ (रिकवरी बेड) ₹4-4 लाख प्रति यूनिट की दर से खरीदने का ऑर्डर दिया है। दोनों ट्रॉलियों की कुल कीमत ₹8 लाख निर्धारित की गई है। जबकि जानकारों का दावा है कि इसी श्रेणी की रिकवरी ट्रॉली खुले बाजार में अधिकतम ₹2 लाख प्रति यूनिट तक उपलब्ध हो जाती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इतनी महंगी ट्रॉली खरीदने की आवश्यकता क्या थी और क्या सरकारी धन का अनावश्यक व्यय किया जा रहा है?

मामले को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि मेडिकल कॉलेज में खरीद प्रक्रिया को लेकर पहले भी कई विवाद सामने आ चुके हैं। आरोप है कि लगातार ऐसे ऑर्डर जारी किए जा रहे हैं जिनमें वित्तीय नियमों की अनदेखी की जा रही है।

वित्त नियंत्रक बोले— मेरे संज्ञान में नहीं है

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मेडिकल कॉलेज के वित्त नियंत्रक डॉ. राघवेंद्र सिंह ने इस खरीद के संबंध में पूछे जाने पर कहा कि “यह मामला मेरे संज्ञान में नहीं है।”

उनके इस बयान के बाद बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि यदि वित्त नियंत्रक को ही खरीद की जानकारी नहीं है तो आखिर इतनी बड़ी राशि का ऑर्डर किस आधार पर जारी किया गया?

बिना वित्तीय स्वीकृति कैसे जारी हो रहे खरीद आदेश?

सरकारी वित्तीय नियमों के अनुसार किसी भी सामग्री की खरीद से पहले सक्षम वित्तीय प्राधिकारी की स्वीकृति आवश्यक होती है। बिना वित्तीय अनुमोदन के खरीद आदेश जारी करना नियमों के विपरीत माना जाता है।

इसके बावजूद आरोप है कि मेडिकल कॉलेज प्रशासन लगातार ऐसे खरीद आदेश जारी कर रहा है जिनकी वित्तीय प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। यदि यह आरोप सही हैं तो यह न केवल वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन है बल्कि सरकारी धन के उपयोग की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

भुगतान रुका तो कोर्ट के आदेश का सहारा?

सूत्रों का कहना है कि बिना विधिवत वित्तीय स्वीकृति के यदि किसी आपूर्तिकर्ता को सामग्री उपलब्ध कराने का आदेश दे दिया जाता है और बाद में भुगतान अटक जाता है तो संबंधित फर्म न्यायालय की शरण ले सकती है।

इसके बाद न्यायालय के आदेश का हवाला देकर भुगतान किए जाने की स्थिति बन जाती है। आरोप है कि इस प्रक्रिया का लाभ उठाकर नियमों को दरकिनार करते हुए खरीद और भुगतान की राह आसान बनाई जा रही है।

पहले भी विवादों में रहा मेडिकल कॉलेज

मेडिकल कॉलेज पहले भी खरीद प्रक्रियाओं को लेकर चर्चाओं में रहा है। हाल के दिनों में एयर कंडीशनर किराए पर लेने, कोरियर सेवा पर असामान्य खर्च तथा अन्य खरीद मामलों को लेकर भी सवाल उठ चुके हैं। अब ₹8 लाख की दो रिकवरी ट्रॉलियों की खरीद ने एक बार फिर प्रशासनिक कार्यशैली पर बहस छेड़ दी है।

उठ रही जांच की मांग

जानकारों का कहना है कि यदि खुले बाजार और GeM पोर्टल पर उपलब्ध समान गुणवत्ता के उपकरणों की कीमत में बड़ा अंतर है तो पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराई जानी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि खरीद से पहले सभी वैधानिक वित्तीय स्वीकृतियां प्राप्त की गई थीं या नहीं।
यदि खरीद प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हुई है तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग की निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

नोट:

यह समाचार उपलब्ध दस्तावेज़ों, संबंधित अधिकारी के बयान और लगाए गए आरोपों पर आधारित है। खुले बाजार में कीमत संबंधी दावा स्वतंत्र सत्यापन का विषय है। संबंधित पक्ष का विस्तृत पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जायेगा।

Girijesh Tiwari

गिरिजेश तिवारी वरिष्ठ एवं मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। उन्हें प्रिंट मीडिया में लंबे समय का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा और यूनाइटेड भारत जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में प्रतापगढ़ से दैनिक पॉड के संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।

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