
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश पुलिस के अभियान ऑपरेशन CYVAJRA के तहत लखनऊ साइबर क्राइम थाना पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क का खुलासा किया है। पुलिस ने ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो भारतीय नागरिकों के दस्तावेजों और ई-केवाईसी का दुरुपयोग कर फर्जी ई-सिम तैयार कर विदेशों में बैठे साइबर अपराधियों को उपलब्ध करा रहा था।
इन ई-सिम का इस्तेमाल कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट, निवेश धोखाधड़ी, ओटीपी फ्रॉड और ट्रेडिंग फ्रॉड जैसे अपराधों में किया जा रहा था। पुलिस ने इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
70 लाख की ठगी, 35 लाख रुपये पुलिस ने कराए फ्रीज
पुलिस के अनुसार एक पीड़ित को फोन कर खुद को एटीएस पुणे का अधिकारी बताया गया। इसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर मामलों में फंसाने की धमकी देकर लगातार वीडियो कॉल के जरिए मानसिक दबाव बनाया गया।
आरोप है कि पीड़ित को कई दिनों तक तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” में रखा गया और डराकर उसकी बैंक जमा राशि और एफडी अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कराई गई।
पीड़ित ने भय के कारण करीब 70 लाख रुपये चार बैंक खातों में भेज दिए। शिकायत मिलने के बाद साइबर पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए तीन बैंक खातों में जमा 35 लाख रुपये फ्रीज करा दिए।
गरीब व्यक्ति के नाम पर जारी सिम का हुआ दुरुपयोग
जांच के दौरान पुलिस ने उस मोबाइल नंबर की जांच की, जिससे पहली कॉल की गई थी। तकनीकी विश्लेषण में पता चला कि सिम लखनऊ के एक अधिकृत पॉइंट ऑफ सेल से जारी हुआ था।
जब सिम धारक का सत्यापन किया गया तो वह सामान्य व्यक्ति निकला, जिसे जानकारी तक नहीं थी कि उसके नाम पर जारी सिम का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध में किया जा रहा है।
डबल ई-केवाईसी कर तैयार करते थे फर्जी ई-सिम
पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी सुमित कुमार रावत अधिकृत जियो सिम विक्रेता था। उसका संपर्क एयरटेल सेवा प्रदाता ईशु यादव से था।
आरोप है कि सुमित नया सिम लेने या नंबर पोर्ट कराने वाले ग्राहकों से तकनीकी समस्या का बहाना बनाकर दो बार ई-केवाईसी करवाता था। एक सिम ग्राहक को दिया जाता था, जबकि उसी दस्तावेज के आधार पर दूसरा सिम गुप्त रूप से सक्रिय कर लिया जाता था।
इसके बाद इन सिम को ई-सिम में बदलकर एक्टिवेशन क्यूआर कोड तैयार किए जाते थे।
क्रिप्टोकरेंसी से होता था भुगतान
पुलिस के अनुसार सुमित प्रत्येक सक्रिय ई-सिम को 325 रुपये में मुख्य आरोपी प्रवीण श्रीवास्तव उर्फ अमित को बेचता था।
इसके बाद प्रवीण इन ई-सिम को टेलीग्राम के जरिए विदेशी साइबर अपराधियों तक पहुंचाता था। पुलिस के मुताबिक विदेशी खरीदार लगभग 50 यूएसडीटी प्रति ई-सिम भुगतान करते थे और लेन-देन क्रिप्टोकरेंसी के जरिए होता था।
जांच में आरोपी के क्रिप्टो वॉलेट से 144 यूएसडीटी मिलने की बात भी सामने आई है।
कंबोडिया में बैठे ठग करते थे भारतीय नंबरों का इस्तेमाल
पुलिस जांच में पता चला कि भारतीय मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल कंबोडिया में बैठे साइबर अपराधी भारत में सक्रिय होने का भ्रम पैदा करने के लिए करते थे।
इन नंबरों के जरिए ठग पुलिस, जांच एजेंसियों और दूरसंचार सत्यापन प्रणाली को चकमा देकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट, निवेश फ्रॉड और अन्य साइबर अपराधों का शिकार बनाते थे।
105 सिम कार्ड समेत डिजिटल साक्ष्य बरामद
साइबर पुलिस ने आरोपियों के पास से:
- 3 मोबाइल फोन
- 105 सिम कार्ड
- 5 खुले सिम पैकेट
- ई-सिम से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड
- टेलीग्राम चैट
- क्रिप्टो वॉलेट संबंधी जानकारी
- अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य
बरामद किए हैं।
पुलिस अब गिरोह से जुड़े अन्य सदस्यों, विदेशी संपर्कों और वित्तीय लेन-देन की जांच कर रही है।
पुलिस ने लोगों को किया सावधान
साइबर पुलिस ने लोगों से अपील की है कि भारत में “डिजिटल अरेस्ट” नाम की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है।
यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, एटीएस या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर धमकाता है और पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाता है तो तुरंत सतर्क हो जाएं।
किसी भी साइबर ठगी की स्थिति में तुरंत साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराने की अपील की गई है।





