
प्रतापगढ़।
जिले में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों के चयन से जुड़ी शिकायतों की जांच को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। निदेशालय बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार, उत्तर प्रदेश लखनऊ ने 22 जुलाई 2026 को जिला कार्यक्रम अधिकारी प्रतापगढ़ को पत्र भेजकर शिकायतों की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई करते हुए दो दिवस के भीतर जांच आख्या शासन को उपलब्ध कराने के साथ ही उसकी प्रति शिकायतकर्ताओं को भी देने का स्पष्ट निर्देश दिया था। बावजूद इसके अब तक जांच पूरी नहीं हो सकी है।
निदेशालय के पत्र में प्रतापगढ़ से संबंधित चार शिकायतों का उल्लेख किया गया है। इनमें आंगनबाड़ी कार्यकत्री चयन प्रक्रिया में अनियमितता से लेकर भ्रष्टाचार के आरोप तक लगाए गए हैं। एक शिकायत में भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारी, कर्मचारी और लघु उद्योग संचालक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। वहीं अन्य शिकायतों में आंगनबाड़ी कार्यकत्री पद पर चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
दो दिन में जांच का आदेश, अब तक नतीजा नहीं
निदेशालय ने शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट रूप से निर्देशित किया था कि शिकायतों में उल्लिखित तथ्यों की जांच कर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई करते हुए उसकी आख्या दो दिवस में निदेशालय को उपलब्ध कराई जाए।
साथ ही शिकायतकर्ताओं को भी की गई कार्रवाई से अवगत कराने को कहा गया था।
लेकिन शासन के इस स्पष्ट आदेश के बावजूद निर्धारित समय सीमा में जांच पूरी न होना विभागीय कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है।
खास बात यह है कि शासन स्तर से समयबद्ध जांच के निर्देश दिए जाने के बाद भी कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन जांच रिपोर्ट का अभी तक सामने न आना अपने आप में गंभीर मामला है।
जिन पर आरोप, उन्हीं पर जांच की जिम्मेदारी?
सबसे गंभीर सवाल जांच की निष्पक्षता को लेकर उठ रहा है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं, उन्हीं से जुड़े विभागीय तंत्र को जांच की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। ऐसे में जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यदि आरोपों की जांच उन्हीं अधिकारियों अथवा उनके अधीनस्थ तंत्र से कराई जाती है, जिनकी भूमिका शिकायत में सवालों के घेरे में है, तो शिकायतकर्ता को निष्पक्ष जांच की उम्मीद कैसे होगी? यही सवाल अब विभाग के सामने खड़ा है।
‘गड़बड़ी दुरुस्त’ करने में जुटे जिम्मेदार!
उधर, सूत्रों के मुताबिक शिकायतों के बाद विभागीय स्तर पर अब कथित तौर पर पहले हुई गड़बड़ियों को दुरुस्त करने की कवायद शुरू हो गई है। चर्चा है कि जांच से पहले ही संबंधित अभिलेखों और प्रक्रिया को दुरुस्त करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि जांच के दौरान अनियमितताएं सामने न आएं।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह मामला और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि जांच शुरू होने से पहले ही रिकॉर्ड अथवा प्रक्रिया में बदलाव किए जाने की कोशिश जांच की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है।
शासन के आदेश की समयसीमा का क्या हुआ?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब निदेशालय ने दो दिवस के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट शासन और शिकायतकर्ताओं को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था, तो आखिर जांच अब तक लंबित क्यों है? क्या जांच में जानबूझकर देरी की जा रही है या फिर विभागीय स्तर पर जांच को लेकर कोई अन्य पेच है?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन और शासन स्तर से इस मामले में क्या कदम उठाया जाता है। क्या शिकायतों की जांच उसी विभागीय तंत्र से कराई जाएगी या किसी स्वतंत्र अधिकारी से जांच कराकर पूरे मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित की जाएगी, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
शिकायतकर्ताओं ने शासन के आदेश के बावजूद जांच लंबित रहने और जांच की जिम्मेदारी को लेकर उठ रहे सवालों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है, ताकि आंगनबाड़ी चयन प्रक्रिया में यदि वास्तव में कोई अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सके।





