UP विधान परिषद में शिक्षक MLC उमेश द्विवेदी ने उठाए दो बड़े मुद्दे, एडेड शिक्षकों की पदोन्नति और स्कूल बस नियमों में राहत की मांग
उत्तर प्रदेश विधान परिषद में शिक्षक MLC उमेश द्विवेदी ने एडेड विद्यालयों के आयोग से चयनित शिक्षकों को प्रधानाचार्य पद पर पदोन्नति देने और स्कूल बसों की आयु सीमा व परमिट व्यवस्था में राहत की मांग उठाई। जानिए क्या कहा।

प्रतापगढ़।
उत्तर प्रदेश विधान परिषद में शिक्षक MLC उमेश द्विवेदी ने शिक्षा व्यवस्था और निजी विद्यालयों से जुड़े दो अहम मुद्दे उठाते हुए सरकार से जल्द निर्णय लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि सहायता प्राप्त (एडेड) विद्यालयों में अब लगभग सभी शिक्षक और प्रवक्ता आयोग के माध्यम से चयनित होकर नियुक्त हो रहे हैं। ऐसे में उन्हें भी राजकीय विद्यालयों की तरह प्रधानाचार्य पद पर पदोन्नति का अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने सदन में कहा कि कई शिक्षक 10, 12, 15 और 20 वर्षों तक सेवा देने के बावजूद पदोन्नति से वंचित रह जाते हैं। इससे उनका मनोबल और सामाजिक सम्मान प्रभावित होता है। उन्होंने सरकार से आयोग से चयनित शिक्षकों को भी प्रधानाचार्य पद पर पदोन्नति का अधिकार सुनिश्चित करने की मांग की।
H2: स्कूल बसों की आयु सीमा में राहत देने की उठाई मांग
शिक्षक MLC उमेश द्विवेदी ने स्कूल बसों के संचालन से जुड़े नियमों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि स्कूल बसें नियमित रूप से छह माह या एक वर्ष के अंतराल पर फिटनेस जांच कराती हैं, तो केवल आयु सीमा के आधार पर उन्हें संचालन से बाहर करना उचित नहीं है।
उन्होंने तर्क दिया कि व्यावसायिक बसें प्रतिदिन 1000 से 1200 किलोमीटर तक चलती हैं, जबकि स्कूल बसें सामान्यतः 50 से 100 किलोमीटर तक ही संचालित होती हैं। ऐसे में फिटनेस के आधार पर बसों के संचालन की अनुमति दी जानी चाहिए।
H2: नई बस खरीदने का बोझ छात्रों पर पड़ता है
उमेश द्विवेदी ने कहा कि एक नई स्कूल बस की कीमत लगभग 20 लाख रुपये होती है। बार-बार नई बसें खरीदने का आर्थिक बोझ अंततः विद्यालयों और छात्रों पर पड़ता है। इसलिए सरकार को स्कूल बसों के लिए व्यावहारिक नीति बनानी चाहिए, ताकि सुरक्षित और फिट बसों का संचालन जारी रह सके।
H2: स्कूल बस परमिट व्यवस्था पर भी उठाए सवाल
उन्होंने प्रदेश में स्कूल बसों के लिए लागू परमिट व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि उत्तर प्रदेश में करीब एक लाख स्कूल बसें संचालित हो रही हैं और परमिट के नाम पर आरटीओ कार्यालयों में अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि परमिट व्यवस्था उन वाहनों के लिए होती है जो निर्धारित वाणिज्यिक रूट पर चलते हैं, जबकि स्कूल बसें स्थानीय स्तर पर सीमित दूरी में बच्चों को लाने और ले जाने का कार्य करती हैं। इसलिए इनके लिए अलग और सरल व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
H2: सरकार से ठोस नीति बनाने की मांग
उमेश द्विवेदी ने बताया कि इस विषय पर विभागीय मंत्री से भी चर्चा हो चुकी है। उन्होंने कहा कि परिवहन विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी स्कूल बसों में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित कराना है। यदि सभी सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है, तो परमिट के नाम पर अनावश्यक उत्पीड़न उचित नहीं है।
उन्होंने सरकार से एडेड विद्यालयों के शिक्षकों की पदोन्नति, स्कूल बसों की आयु सीमा और परमिट व्यवस्था को लेकर स्पष्ट एवं व्यावहारिक नीति बनाने की मांग की, ताकि शिक्षा संस्थानों और शिक्षकों को राहत मिल सके।





