भारतीय संविधान में सामान्य श्रेणी की कोई परिभाषा नहीं, यह समानता के अधिकार पर बड़ा सवाल: बृजेश तिवारी सेवादार
सामाजिक कार्यकर्ता बृजेश तिवारी ने भारतीय संविधान में सामान्य श्रेणी की स्पष्ट परिभाषा न होने पर सवाल उठाते हुए कहा कि वास्तविक समानता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए सरकार को इस संबंध में ठोस कानूनी व्यवस्था करनी चाहिए।

लालगंज, प्रतापगढ़। सामाजिक कार्यकर्ता बृजेश तिवारी सेवादार ने भारतीय संविधान में सामान्य (जनरल) श्रेणी की स्पष्ट संवैधानिक परिभाषा न होने का मुद्दा उठाते हुए केंद्र सरकार से इस दिशा में ठोस पहल करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है, लेकिन सामान्य श्रेणी की आज तक कोई स्पष्ट संवैधानिक परिभाषा तय नहीं की गई, जिससे समानता के सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।
जारी बयान में बृजेश तिवारी ने कहा कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत वर्ष 1950 से परिभाषित किया गया है। वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की पहचान मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर की गई। इसके विपरीत सामान्य श्रेणी के लिए आज तक कोई स्पष्ट संवैधानिक परिभाषा या पृथक कानून नहीं बनाया गया है।
उन्होंने कहा कि सामान्य श्रेणी की स्पष्ट परिभाषा होने से सरकारी नीतियों और योजनाओं में पारदर्शिता आएगी, जनसंख्या एवं आर्थिक सर्वेक्षणों के आंकड़े अधिक सटीक होंगे, सभी वर्गों के लिए न्याय एवं समान अवसर सुनिश्चित करने में सुविधा होगी तथा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और संतुलन स्थापित करने में भी मदद मिलेगी।
बृजेश तिवारी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार, संसद, नीति आयोग और संबंधित आयोगों ने अब तक इस विषय पर कोई ठोस पहल नहीं की है। उनका कहना था कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने के बजाय वोट बैंक की राजनीति तक सीमित रखा।
उन्होंने मांग की कि संविधान में सामान्य श्रेणी की स्पष्ट परिभाषा निर्धारित कर सभी नागरिकों के लिए वास्तविक समानता, न्याय और संवैधानिक संतुलन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही उन्होंने इस विषय पर व्यापक राष्ट्रीय बहस शुरू करने की आवश्यकता भी जताई।





