
प्रश्न: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को आप किस नजरिए से देखते हैं?
डॉ. संजय कुमार दुबे: देश की राजनीति में जब भविष्य की बिसात बिछाई जाती है, तो बड़े से बड़े मोहरे की कुर्बानी देने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई जाती। लंबे समय से घमासान का केंद्र बने शिक्षा मंत्रालय और नीट-यूजी (NEET-UG) पेपर लीक विवाद के बाद अब धर्मेंद्र प्रधान का पद से हटना महज एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल की एक सोची-समझी टैक्टिकल रिट्रीट (रणनीतिक वापसी) माना जाना चाहिए।
प्रश्न: इस इस्तीफे के बाद देश में किस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है?
डॉ. दुबे: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने सम्पूर्ण भारत में कई पक्षों को एक साथ संतुष्ट होने के साथ-साथ अपनी-अपनी पीठ थपथपाने का मौका दे दिया है और ये सभी पक्ष अब राहत की साँस ले रहे हैं।
प्रश्न: किन-किन पक्षों को इससे सबसे अधिक संतोष मिला?
डॉ. दुबे: पहला पक्ष सरकार के शुभचिंतकों का है। वे संतुष्ट हैं कि चलो आई हुई बड़ी बला एक छोटे से इस्तीफे से खत्म हो गई।
दूसरा पक्ष काकरोच पार्टी के कर्ता-धर्ताओं का है। वे खुश हैं कि हमने वह कर दिखाया जो पिछले 12 वर्षों से भारत में कोई भी पार्टी या संगठन नहीं कर पाया था, अर्थात सरकार पहली बार झुकी।
तीसरा पक्ष भारत की लगभग सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियों—कांग्रेस, सपा, तृणमूल कांग्रेस आदि—का है। वे संतुष्ट हैं कि चलो पहली बार इन 12 वर्षों में मोदी सरकार बैकफुट पर तो आई और धर्मेंद्र प्रधान ने सरकार की मिट्टी पलीद कराने के बाद इस्तीफा भी दिया।
चौथा पक्ष उन सोशल एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवियों का है जो अन्ना आंदोलन के बाद से भारतीय राजनीति में हाशिए पर चले गए थे। वे खुश हैं कि इतने वर्षों बाद मीडिया ने उन्हें फिर से देश के सामने दिखाया।
प्रश्न: लेकिन आपकी नजर में इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश क्या है?
डॉ. दुबे: अगर इस पूरी लड़ाई को गंभीरता से देखें तो सरकार ने बहुत ही चालाकी से विपक्ष को किनारे करके एक ऐसी पार्टी, जिसका अस्तित्व अभी शैशवावस्था में ही है, अर्थात काकरोच पार्टी, उसे भारत के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस से भी बड़ा दर्जा प्रदान कर दिया। सरकार ने केवल उसी पार्टी के प्रवक्ताओं और प्रतिनिधियों से वार्ता की और सम्पूर्ण विपक्ष को किनारे लगा दिया। एक तरह से काकरोच पार्टी को मुख्य विपक्षी पार्टी जैसा महत्व मिल गया, जबकि उसके कर्ता-धर्ता अभी खुद ही कन्फ्यूज हैं कि उन्हें करना क्या है।
प्रश्न: क्या आप इसे सरकार की राजनीतिक रणनीति मानते हैं?
डॉ. दुबे: एक तरह से अगर आप गंभीरता से विचार करें तो पाएंगे कि एक बार फिर दो गुजरातियों ने सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दिलवाकर सम्पूर्ण विपक्ष को किनारे लगा दिया और आंदोलन की धार को कुंद कर दिया।
प्रश्न: क्या आपको लगता है कि यह पूरा घटनाक्रम महंगाई, रोजगार और विदेश नीति जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश भी हो सकता है?
डॉ. दुबे: यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सब बढ़ती महंगाई, रोजगार, असफल विदेश नीति आदि मुद्दों से आम आदमी का ध्यान भटकाने और सम्पूर्ण विपक्ष को किनारे लगाने के लिए सरकार द्वारा रचा गया केवल और केवल एक प्रोपोगंडा था, या वास्तव में जेन-जी के बदलते हुए तेवर ऐसे थे कि सरकार को झुकना पड़ा और 12 वर्षों में पहली बार बैकफुट पर जाना पड़ा।
प्रश्न: अंत में, इस आंदोलन के भविष्य को आप कैसे देखते हैं?
डॉ. दुबे: सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस आंदोलन का कोई दीर्घकालीन परिणाम आएगा, या यह आंदोलन भी अन्ना आंदोलन की तरह दो-चार लोकसभा और विधानसभा सीटों पर विजय तक पहुँचकर सिमट कर रह जाएगा।



